ब्रह्मचर्य क्या होता है और जान

ब्रह्मचर्य क्या होता है और जान

* ब्रह्मचर्य का पालन करने वालों को ब्रह्मचारी कहते हैं।

* ब्रह्मचर्य दो शब्दो 'ब्रह्म' और 'चर्य' से बना है। ब्रह्म का अर्थ परमात्मा; चर्य का अर्थ विचरना, अर्थात परमात्मा मे विचरना, सदा उसी का ध्यान करना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है।

* ब्रह्मचर्य योग के आधारभूत स्तंभों में से एक है। 

* ब्रह्मचर्य का अर्थ है सात्विक जीवन बिताना, शुभ विचारों से अपने वीर्य का रक्षण करना, भगवान का ध्यान करना और विद्या ग्रहण करना। 

* यह वैदिक धर्म वर्णाश्रम का पहला आश्रम भी है, जिसके अनुसार यह 0-25 वर्ष तक की आयु का होता है और जिस आश्रम का पालन करते हुए विद्यार्थियों को भावी जीवन के लिये शिक्षा ग्रहण करनी होती है। 

* ब्रह्मचर्य से असाधारण ज्ञान पाया जा सकता है वैदिक काल और वर्तमान समय के सभी ऋषियों ने इसका अनुसरण करने को कहा है 

* क्यों महत्वपूर्ण है ब्रह्मचर्य- हमारी जिंदगी मे जितना जरुरी वायु ग्रहण करना है उतना ही जरुरी ब्रह्मचर्य है। 

* वेद का उपदेश है - ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर कन्या युवा पति को प्राप्त करे ।

* आज से पहले हजारों वर्ष से हमारे ऋषि मुनि ब्रह्मचर्य का तप करते आए हैं क्योंकि इसका पालन करने से हम इस संसार के सर्वसुखो की प्राप्ति कर सकते हैं।

* महाभारत के रचयिता व्यासजी ने विषयेन्द्रिय द्वारा प्राप्त होने वाले सुख के संयमपूर्वक त्याग करने को ब्रह्मचर्य कहा है।

* शतपथ ब्राह्मण में ब्रह्मचारी की चार प्रकार की शक्तियों का उल्लेख आता है-

> अग्नि के समान तेजस्वी,

> मृत्यु के समान दोष एवं दुर्गुणों के मारण की शक्ति,

> आचार्य के समान दूसरों को शिक्षा देने की शक्ति,

> संसार के किसी भी स्थान, वस्तु, व्यक्ति आदि की अपेक्षा रखे बिना आत्माराम होकर रहना।


ब्रह्मचर्य से लाभ

> ब्रह्मचर्य मनुष्य का मन उनके नियंत्रण में रहता है।

> ब्रह्मचर्य का पालन करने से देह निरोगी रहती है।

> ब्रह्मचर्य का पालन करने से मनोबल बढ़ता है।

> ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग प्रतिरोधक शक्ति बढती है।

> ब्रह्मचर्य मनुष्य की एकाग्रता और ग्रहण करने की क्षमता बढाता है।

> ब्रह्मचर्य पालन करने वाला व्यक्ति किसी भी कार्य को पूरा कर सकता है।

> ब्रह्मचारी मनुष्य हर परिस्थिति में भी स्थिर रहकर उसका सामना कर सकता है।

> ब्रम्हचर्य के पालन से शारीरिक क्षमता , मानसिक बल , बौद्धिक क्षमता और दृढ़ता बढ़ती है।

> ब्रम्हचर्य का पालन करने से चित्त एकदम शुद्ध हो जाता है।


ब्रह्मचर्य नाश से हानियां 

* ब्रह्मचर्य को नष्ट करने से आधि भौतिक , आधि दैविक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार की हानियाँ होती है 

* आधि भौतिक हानि यह है कि शरीर कमजोर हो जाता है , नेत्रों की दृष्टि निर्बल पड़ जाती है । पाचन क्रिया मंद होती है , फेफड़े निर्बल बनते हैं , सहन शक्ति घटती है । तेज नष्ट होता है और दुर्बलता के कारण देह में नाना प्रकार के रोगों का अड्डा स्थापित हो जाता है

* आधि दैविक हानियाँ यह हैं कि - मस्तिष्क पोला हो जाता है । बुद्धि मंद पड़ जाती है , स्मरण शक्ति का ह्मस होता है । सूक्ष्म विचारों को ग्रहण करने की शक्ति घट जाती है , विद्या सीखी नहीं जाती । 

* ब्रह्मचर्य नष्ट करने से जो आध्यात्मिक हानि होती है वह तो बहुत ही दुखदायी है । आत्मा के स्वरूप को पहचानना , ईश्वर में परायण होना , धर्म कर्तव्यों पर बढ़ने के लिए कदम उठाना विषय वासना में रत मनुष्य के लिए क्या कभी संभव है ? ऐसे व्यक्तियों के लिए योग साधना एक कल्पना का विषय ही हो सकता है । कई असंयमी मनुष्य योग क्रियाओं में उलझे तो उन्हें तपैदिक , पागलपन या अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ा

* ब्रह्मचर्य को नष्ट करना एक ऐसा अपराध है जिसका फल न केवल अपने को वरन् समस्त सृष्टि को भोगना पड़ता है

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